Friday, 27 January 2012

ॐ श्री दुर्गा चालीसा ॐ















ॐ श्री दुर्गा चालीसा ॐ
|| नमो नमो दुर्गे सुख करनी || निराकार है ज्योति तुम्हारी
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी || तिहूँ लोक फैली उजयारी||
|| शशि ललाट मुख महाविशाला || रूप मातु को अधिक सुहावे
नेत्र लाल भृकुटी विकराला || दरस करत जन अति सुख पावे ||
|| तुम संसार शक्ति लाया किना || अन्नपूर्ण हुई जग पाला
पालन हेतु अन्ना धान दिना || तुम्ही आदी सुंदरी बाला ||
|| प्रलय काला सब नाशन हरी || शिव योगी तुम्हरे गुना गावें
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी || ब्रह्म विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ||
|| रूप सरस्वती को तुम धारा || धर्यो रूप नरसिम्हा को अम्बा
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिना उबारा || प्रगत भयं फार कर खम्बा ||
|| रक्षा करी प्रहलाद बचायो || लक्ष्मी रूप धरो जग महीन
हिरनाकुश को स्वर्ग पठायो || श्री नारायण अंगा समिहहीं ||
|| क्षीर सिन्धु में करत विलासा || हिंगलाज में तुम्हीं भवानी
दया सिन्धु दीजे मन असा || महिमा अमिट न जेट बखानी ||
|| मातंगी धूमावती माता || श्री भैरव लारा जोग तरनी
भुवनेश्वरी बागला सुखदाता || छिनना भला भावः दुःख निवारानी ||
|| केहरी वहां सोह भवानी || कर में खप्पर खडग विराजे
लंगूर वीर चालत अगवानी || जाको देख कल दान भजे ||
|| सोहे अस्त्र और त्रिशूला || नगरकोट में तुम्ही विराजत
जसे उठता शत्रु हिय शूला || तिहूँ लोक में डंका बाजत ||
|| शुम्भु निशुम्भु दनुज तुम मारे || महिषासुर नृप अति अभिमानी
रक्त-बीजा शंखन संहारे || जेहि अघा भर माहि अकुलानी ||
|| रूप कराल कलिका धारा || पण गर्हा संतान पर जब जब
सेन सहित तुम तिन संहार || भाई सहाय मातु तुम तब तब ||
|| अमर्पुनी अरु बसवा लोक || ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी
तवा महिरना सब रहें असोका || तुम्हें सदा पूजें नर नारी ||
|| प्रेम भक्ति से जो यश गावे || ध्यावे तुम्हें जो नर मन ली
दुःख-दरिद्र निकट नहीं आवे || जनम-मरण ताको छुटी जाई ||